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भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण
INSURANCE REGULATORY AND
DEVELOPMENT AUTHORITY OF INDIA
आईआरडीएआई/एफएण्डआई/ओआरडी/विविध/119/6/2023
2 जून 2023
सहारा इंडिया लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि. के जीवन बीमा व्यवसाय का हस्तांतरण
एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि. को करने के लिए
बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 52बी की उप-धारा (2) के अनुसार
आदेश
- संदर्भ के लिए निम्नलिखित की ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है:
- i. आईआरडीएआई आदेश सं. आईआरडीएआई/ एफएण्डए/ ओआरडी/ विविध/ 310/12/2020 दिनांक 30 दिसंबर 2020.
- ii. माननीय प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण द्वारा पारित आदेश दिनांक 11 जनवरी 2018.
- iii. आईआरडीएआई का आदेश आईआरडीएआई/ एफएण्डए/ ओआरडी/ एफए/ 148/ 06/2017 दिनांक 23 जून 2017.
- iv. आईआरडीएआई का आदेश आईआरडीएआई/ एफएण्डए/ ओआरडी/ एफए/ 134/ 06/2017 दिनांक 12 जून 2017.
- सहारा इंडिया लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि. (एसआईएलआईसी) को जीवन बीमा का व्यवसाय करने के लिए पंजीकरण प्रमाणपत्र दिनांक 6 फरवरी 2004 को प्रदान किया गया था। 31 मार्च 2023 की स्थिति के अनुसार एसआईएलआईसी की शेयरधारिता का स्वरूप निम्नानुसार था:
| शेयरधारक का नाम | शेयरों का % |
|---|
| मेसर्स सहारा इंडिया फाइनेंसियल कारपोरेशन लिमिटेड (एसआइएफसीएल) | 50.00 |
| मेसर्स सहारा केयर लिमिटेड (एससीएल) | 40.00 |
| मेसर्स सहारा इंडिया कमर्शियल कारपोरेशन लिमिटेड (एसआईसीसीएल) | 4.27 |
| मेसर्स सहारा इन्फ्रास्ट्रक्चर एण्ड हाउसिंग लिमिटेड (एसआईएचएल) | 3.82 |
| मेसर्स सहारा प्राइम सिटी लिमिटेड | 1.27 |
| मेसर्स सहारा वन मीडिया एण्ड एन्टरटेनमेंट लिमिटेड | 0.48 |
| मेसर्स मास्टर केमिकल्स लिमिटेड | 0.16 |
- भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) के आदेश आईआरडीएआई/ एफएण्डए/ओआरडी/एफए/134/06/2017 दिनांक 12 जून 2017 में विस्तृत रूप में निर्धारित चिंताओं के गंभीर स्वरूप को ध्यान में रखते हुए यह विश्वास करने के लिए निश्चयात्मक कारण हैं कि बीमाकर्ता ऐसे तरीके से कार्य कर रहा था जो संभवतः एसआईएलआईसी की जीवन बीमा पालिसियों के धारकों के हितों और समग्र रूप में बीमा क्षेत्र की सुव्यवस्थित वृद्धि के लिए हानिकर हो सकता था। तदनुसार, एसआईएलआईसी को बीमा अधिनियम, 1938 (बीमा अधिनियम) की धारा 52ए की उप-धारा (1) के उपबंधों को लागू करने के लिए एक उपयुक्त मामले के रूप में पाया गया जो प्राधिकरण के निर्देशन और नियंत्रण के अंतर्गत बीमाकर्ता के कार्यों का प्रबंध करने के लिए एक प्रशासक की नियुक्ति करने हेतु प्राधिकरण को सशक्त बनाती है। तदनुसार, आईआरडीएआई के एक महाप्रबंधक को प्रशासक के रूप में 12 जून 2017 को तत्काल प्रभाव से नियुक्त किया गया।
- उक्त प्रशासक ने दिनांक 22 जून 2017 के पत्र के द्वारा बीमा अधिनियम की धारा 52बी की उप-धारा (1) के अधीन अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। प्रशासक के निष्कर्षों ने एसआईएलआईसी की अभिशासन प्रणाली की कुल विफलता को निर्दिष्ट किया तथा यह कि पालिसीधारकों का हित खतरे में था। प्रशासक की यह राय थी कि निम्नलिखित कारणों से कंपनी को व्यवसाय करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए:
- i. कंपनी के प्रवर्तक ‘योग्य और उपयुक्त’ (फिट एण्ड प्रोपर) नहीं रहे;
- ii. प्रतिभूति जमाओं के नाम से रु. 78.15 करोड़ की राशि का विपथन किया गया था;
- iii. शेयरधारक और निदेशक बोर्ड समुत्थान की योजना के संबंध में उत्सुक नहीं थे;
- iv. कंपनी मुख्य रूप से आरक्षित निधियों के निर्मोचन पर बनी रही थी। तथापि, स्थिति धारणीय नहीं थी क्योंकि कंपनी के नये प्रीमियम में उल्लेखनीय रूप में गिरावट आई थी;
- v. कंपनी के कार्यों का प्रबंध उसके बोर्ड द्वारा नहीं किया गया था, बल्कि उक्त कार्यों का प्रबंध गैर-कार्यकारी अध्यक्ष के द्वारा किया गया था।
- उपर्युक्त को ध्यान में रखते हुए, पालिसीधारकों के हितों का संरक्षण करने के लिए प्रशासक के द्वारा निम्नलिखित कार्रवाई की सिफारिश की गई थी:
- i. कंपनी को तत्काल प्रभाव से नये व्यवसाय का जोखिम-अंकन रोकने के लिए सूचित किया जा सकता है;
- ii. बीमाकर्ता का वर्तमान व्यवसाय किसी अन्य बीमाकर्ता को हस्तांतरित किया जा सकता है;
- iii. वर्तमान व्यवसाय का हस्तांतरण किये जाने तक नवीकरण प्रीमियम प्राप्त करने और वर्तमान पालिसीधारकों की सर्विस करने के लिए कंपनी को अनुमति दी जा सकती है।
- तदनुसार, प्राधिकरण ने बीमा अधिनियम की धारा 52बी की उप-धारा (2) के अधीन आदेश दिनांक 23 जून 2017 के अनुसार एसआईएलआईसी को निम्नानुसार निदेश दिया:
- i. प्रस्ताव जमाराशियों की प्राप्ति या वसूली न करे तथा नये व्यवसाय का जोखिम-अंकन न करे;
- ii. नवीकरण प्रीमियम की वसूली और लेखांकन जारी रखे; तथा
- iii. वर्तमान व्यवसाय और पालिसीधारकों की सर्विसिंग जारी रखे।
- एसआईएलआईसी के साथ किये गये बहुविध पत्र-व्यवहार और उनको दिये गये वैयक्तिक सुनवाई के अवसर के आधार पर प्राधिकरण इस निष्कर्ष पर पहुँच गया कि एसआईएलआईसी को जीवन बीमा व्यवसाय करने की अनुमति देना जीवन बीमा पालिसियों के धारकों के हित में नहीं था। अतः यह निर्णय लिया गया था कि एसआईएलआईसी के जीवन बीमा व्यवसाय का हस्तांतरण किसी अन्य जीवन बीमाकर्ता को किया जाना चाहिए।
- उचित प्रक्रिया का अनुसरण करने के उपरांत, एसआईएलआईसी के जीवन बीमा संविभाग के अधिग्राहक के रूप में एक उपयुक्त बीमाकर्ता का चयन किया गया। बीमा अधिनियम की धारा 52बी की उप-धारा (2) के अधीन ऐसे बीमाकर्ता को आईआरडीएआई के आदेश दिनांक 28 जुलाई 2017 के द्वारा नियत दिनांक अर्थात् 31 जुलाई 2017 को एसआईएलआईसी के ‘जीवन बीमा संविभाग’ का अधिग्रहण करने का निदेश दिया गया। इसी आदेश के माध्यम से एसआईएलआईसी को भी नियत दिनांक से “जीवन बीमा व्यवसाय न करने का” निदेश दिया गया।
- एसआईएलआईसी ने माननीय प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष आईआरडीएआई के आदेशों के विरुद्ध अपील प्रस्तुत की। माननीय एसएटी ने अगस्त 2017 और नवंबर 2017 के बीच विभिन्न दिनांकों पर उक्त विषय में सुनवाई का अवसर प्रदान किया। माननीय एसएटी द्वारा 11 जनवरी 2018 को आदेश घोषित और जारी किया गया, जिसमें माननीय एसएटी ने निम्नलिखित निर्णय लिये:
- i. उन्होंने आईआरडीएआई के आदेश दिनांक 12 जून 2017 (प्रशासक की नियुक्ति से संबंधित) तथा आईआरडीएआई के आदेश दिनांक 23 जून 2017 (प्रस्ताव जमाराशियों की प्राप्ति/वसूली/ नये व्यवसाय के जोखिम-अंकन का निषेध करने से संबंधित) को मान्य ठहराया; तथा
- ii. उन्होंने आईआरडीएआई के आदेश दिनांक 28 जुलाई 2017 (एसआईएलआईसी के जीवन बीमा संविभाग का हस्तांतरण अभिनिर्धारित बीमाकर्ता को करने से संबंधित) को निरस्त किया तथा इस निदेश के साथ आईआरडीएआई की फाइल के अंतर्गत संपूर्ण मामले को बरकरार रखा कि प्रशासक की प्रश्नगत रिपोर्ट पर अपीलकर्ता (अर्थात् एसआईएलआईसी) से अभ्यावेदन/ प्रतिक्रिया की अपेक्षा करने के स्तर से आगे बढ़ा जाए और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के साथ सामंजस्य रखते हुए एसआईएलआईसी को अपनी बात कहने के लिए सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाए। इसी आदेश में माननीय एसएटी ने यह भी निदेश दिया कि एसआईएलआईसी को आईआरडीएआई द्वारा दी जानेवाली नई सुनवाई के दौरान यदि कोई भी पक्षकार अन्य पक्षकार से कोई दस्तावेज प्रस्तुत करने अथवा ऐसी अपेक्षा करने की इच्छा रखता है, तो उक्त अनुरोध पर भी इस संबंध में एक अवसर प्रदान करने के द्वारा विधि के अनुसार विचार किया जाएगा।
- माननीय एसएटी के उपर्युक्त आदेश दिनांक 11 जनवरी 2018 और उसमें निहित निर्देशों के अनुरूप प्रशासक की प्रश्नगत रिपोर्ट पर एसआईएलआईसी से अभ्यावेदन/प्रतिक्रिया की अपेक्षा करने एवं नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के साथ सामंजस्य रखते हुए अपनी बात कहने के लिए एसआईएलआईसी को अवसर प्रदान करने हेतु एसआईएलआईसी को प्रशासक की रिपोर्ट की एक प्रति उनके उत्तर/प्रतिक्रिया की अपेक्षा करते हुए 18 जनवरी 2018 को उपलब्ध कराई गई। उसपर एसआईएलआईसी की प्रतिक्रियाओं के प्राप्त होने के बाद उक्त मामले की समीक्षा की गई तथा आईआरडीएआई के पत्र दिनांक 15 जनवरी 2019 के पत्र के द्वारा एसआईएलआईसी को कारण बताओ नोटिस (एससीएन) जारी किया गया और सुनवाई का एक और अवसर प्रदान किया गया। वैयक्तिक सुनवाई के लिए 3 दिसंबर 2019 को दिये गये अवसर के उपरांत, एसआईएलआईसी ने अपने पत्र दिनांक 26 दिसंबर 2019 के द्वारा वैयक्तिक सुनवाई के दौरान उनसे अपेक्षित विवरण प्रस्तुत किये।
- माननीय एसएटी द्वारा दिये गये निदेशों का अनुपालन करने के बाद, प्राधिकरण के द्वारा समूचे मामले की सावधानीपूर्वक समीक्षा की गई। प्रशासक, जाँच अधिकारी (बीमा अधिनियम की धारा 33 के अधीन नियुक्त) की टिप्पणियों तथा एसआईएलआईसी के प्रस्तुतीकरणों पर उचित रूप से विचार करने के उपरांत, आईआरडीएआई द्वारा 30 दिसंबर 2020 के आदेश के अनुसार बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 52बी की उप-धारा (2) के अधीन निम्नलिखित निदेश जारी किये गये और विभिन्न सरोकारों का समाधान करने हेतु आवश्यक कदम उठाने के लिए एसआईएलआईसी को एक और अवसर प्रदान किया गयाः
- i. एसआईएलआईसी मेसर्स सहारा इंडिया से रु. 78.15 करोड़ के अग्रिम की वसूली करने के लिए तत्काल कदम उठायेगी। मूल धनराशि की वसूली 3 महीने की अवधि के अंदर की जानी चाहिए तथा ब्याज की पूर्णतः वसूली एक महीने की अतिरिक्त अवधि के अंदर की जानी चाहिए।
- ii. चूँकि प्रवर्तक एसआईएफसीएल, एससीएल, एसआईसीसीएल और एसआईएचएल 'योग्य और उपयुक्त' नहीं पाये गये हैं, अतः इन चार संस्थाओं की शेयरधारिता का अंतरण किन्हीं अन्य 'योग्य और उपयुक्त' प्रवर्तकों को आईआरडीएआई (बीमा कंपनियों के ईक्विटी शेयरों का अंतरण) विनियम, 2015 के उपबंधों के अधीन छह महीने की अवधि के अंदर किया जाना चाहिए।
- iii. एसआईएलआईसी को निदेश दिया जाता है कि वह आईआरडीएआई को 3 महीने के अंदर एक उचित बोर्ड द्वारा अनुमोदित “व्यवसाय की योजना” प्रस्तुत करे।
- iv. एसआईएलआईसी को निदेश दिया जाता है कि 31 मार्च 2020 की स्थिति के अनुसार समाधान न किये गये सभी बैंक खाते (खातों) का समाधान 2 महीने की अवधि के अंदर करे।
- v. एसआईएलआईसी को निदेश दिया जाता है कि अपने आंतरिक नियंत्रण की प्रणालियाँ मजबूत करे तथा एक निरंतर आधार पर सुदृढ़ कंपनी अभिशासन प्रथाओं के अनुसार अपने व्यवसाय का संचालन करे।
- उक्त आदेश दिनांक 30 दिसंबर 2020 के आदेश के निर्गम के बाद, अपनी प्रगति प्रस्तुत करने के लिए एसआईएलआईसी को पर्याप्त अवसर देने के लिए, एसआईएलआईसी से स्थिति की बहुविध अद्यतन जानकारियाँ माँगी गईं। यद्यपि एसआईएलआईसी ने विभिन्न सूचनाओं के द्वारा उत्तर दिया है, परंतु इनमें से किसी ने भी आईआरडीएआई के दिनांक 30 दिसंबर 2020 के आदेश का सार्थक अनुपालन प्रदर्शित नहीं किया है।
- नियमित अनुवर्तनों, बारंबार अनुस्मारकों और परामर्शों के बावजूद, एसआईएलआईसी ने प्राधिकरण के दिनांक 30 दिसंबर 2020 के आदेश का अनुपालन नहीं दर्शाया है। इस निरंतर बने हुए अनुपालन ने प्राधिकरण को एसआईएलआईसी के प्रशासक द्वारा प्रस्तुत की गई अत्यंत हाल की मासिक रिपोर्ट दिनांक 12 मई 2023 की पुनः पुष्टि की। प्रशासक की टिप्पणियों का सारांश नीचे दिया जाता हैः
- i. 29 मार्च 2021 को अथवा उससे पहले मेसर्स सहारा इंडिया से रु. 78.15 करोड़ के अग्रिम की वसूली करने के दायित्व के संबंध में केवल रु. 8 करोड़ की राशि एसआईएलआईसी द्वारा सहारा इंडिया से 12 अगस्त 2021 को प्राप्त की गई है।
- ii. वर्तमान प्रवर्तकों (जो अब योग्य और उपयुक्त नहीं रहे हैं) से एसआईएलआईसी का अंतरण किन्हीं अन्य “योग्य और उपयुक्त” प्रवर्तकों को छह महीने की अवधि के अंदर करने के दायित्व के संबंध में एसआईएलआईसी अथवा उनके प्रवर्तकों के द्वारा कोई भी निश्चित कार्रवाई नहीं की गई है।
- iii. आईआरडीएआई को 3 महीने की अवधि के अंदर बोर्ड द्वारा अनुमोदित “व्यवसाय योजना” प्रस्तुत करने के दायित्व के संबंध में, प्रस्तुत की गई योजना महत्वपूर्ण विषयों के संबंध में अधूरी थी।
- iv. 31 मार्च 2020 की स्थिति के अनुसार शेष सभी समाधान न किये गये बैंक खाते (खातों) का समाधान 2 महीने की अवधि के अंदर करने के दायित्व के संबंध में अभी भी 2 खातों का समाधान नहीं किया गया है।
- v. अपनी आंतरिक नियंत्रण प्रणालियों को सुदृढ़ करने के दायित्व के संबंध में, बार-बार गंभीर परिचालनात्मक समस्याएँ पाई गई हैं जो एसआईएलआईसी की अभिशासन प्रथाओं के संबंध में निरंतर चिंताएँ उत्पन्न करती रहीं।