रजिस्ट्री सं० डी० एल0-33004/99
REGD. NO. D. L.-33004/99
भारत का राजपत्र
The Gazette of India
असाधारण
EXTRAORDINARY
भाग III—खण्ड 4
PART III—Section 4
प्राधिकार से प्रकाशित
PUBLISHED BY AUTHORITY
| सं. 203] | नई दिल्ली, मंगलवार, मई 17, 2016/वैशाख 27, 1938 |
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| No. 203] | NEW DELHI, TUESDAY, MAY 17, 2016/VAISAKHA 27, 1938 |
भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण
अधिसूचना
हैदराबाद, 13 मई, 2016
भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण
(साधारण बीमा - पुनबीमा) विनियम, 2016
फा. सं. भा.बी.वि.वि.प्रा./विनियम/15/127/2016.—बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) की धाराओं 14 और 26 के साथ पठित बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 114ए द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण, बीमा सलाहकार समिति के साथ परामर्श करने के बाद, इसके द्वारा निम्नलिखित विनियम बनाता है, अर्थात्:-
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ
- (1) ये विनियम भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (साधारण बीमा-पुनबीमा) विनियम, 2016 के नाम से जाने जाएँगे।
- (2) ये विनियम बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (साधारण बीमा – पुनबीमा) विनियम, 2013 को प्रतिस्थापित करते हैं।
- (3) ये विनियम सरकारी राजपत्र में इनके प्रकाशन की तारीख को प्रवृत्त होंगे।
2. परिभाषाएँ
इन विनियमों में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
- क) "अधिनियम" से बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) अभिप्रेत है;
- ख) "प्राधिकरण" से अधिनियम की धारा 3 की उप-धारा (1) के अधीन स्थापित भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अभिप्रेत है;
- ग) अध्यर्पक (सीडेंट) (i) एक बीमाकर्ता है जो बीमाकृत व्यक्ति को एक मूल, प्राथमिक पॉलिसी का जोखिम-अंकन और निर्गम करता है तथा एक पुनबीमाकर्ता को संविदात्मक रूप से जोखिम के एक भाग का अंतरण (अध्यर्पण) करता है अथवा (ii) एक पुनबीमाकर्ता है जो वापसीकर्ता (रेट्रोसेशनेयर) को संविदागत जोखिम के भाग का अध्यर्पण करता है;
- घ) `अध्यर्पण' (सेशन) से बीमाकर्ता द्वारा एक पुनबीमाकर्ता को हस्तांतरित बीमा का भाग अभिप्रेत है जिसने मूल बीमाकृत व्यक्ति को पॉलिसी जारी की हो अथवा पुनबीमाकर्ता द्वारा वापसीकर्ता को अध्यर्प्सित संविदागत जोखिम का भाग जारी किया हो;
- ङ) `कवर नोट' संविदा की शर्तों का विवरण देते हुए पुनबीमाकर्ता द्वारा अथवा उसके द्वारा प्राधिकृत पुनबीमा दलाल द्वारा जारी किया गया लिखित दस्तावेज है;
- च) `सीमापार पुनबीमाकर्ता' से वह बीमाकर्ता / पुनबीमाकर्ता अभिप्रेत है जो एक बीमा कंपनी अथवा एक पुनबीमा कंपनी अथवा विदेशी पुनबीमाकर्ता की शाखा के रूप में भारत में पंजीकृत नहीं है, परंतु भारतीय बीमाकर्ता / भारतीय पुनबीमाकर्ता, विदेशी पुनबीमाकर्ता की शाखाओं के साथ पुनबीमा व्यवसाय करता है;
- छ) `ऐच्छिक (फैक्विडेटिव) पुनबीमा' से एक एकल पॉलिसी / जोखिम के भाग का पुनबीमा अभिप्रेत है जिसमें अध्यर्पण की समझौता-वार्ता अलग से होती है तथा पुनबीमाकर्ता और अध्यर्पक के पास प्रत्येक अलग प्रस्तुति को स्वीकार या अस्वीकार करने का विकल्प होता है;
- ज) `वित्तीय वर्ष' इन विनियमों के प्रयोजन के लिए 1 अप्रैल से प्रारंभ करते हुए 31 मार्च तक की अवधि होगी;
- झ) `क्रेंटिंग' से वह प्रक्रिया अभिप्रेत है जिसके द्वारा प्रत्यक्ष बीमाकर्ता पुनबीमाकर्ता को बीमे के अधिकांश का अथवा पूर्णतः अध्यर्पण करता है;
- ञ) `विदेशी पुनबीमाकर्ता की शाखा' से विदेशी पुनबीमाकर्ता की शाखा अभिप्रेत है जिसको समय-समय पर यथासंशोधित भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (लॉयड्स को छोड़कर अन्य विदेशी पुनबीमाकर्ताओं की शाखा कार्यालयों का पंजीकरण और परिचालन) विनियम, 2015 अथवा भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (लॉयड्स इंडिया) विनियम, 2016 के अधीन पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदान किया गया हो;
- ट) इन विनियमों के प्रयोजन के लिए `भारतीय बीमाकर्ता' से वह भारतीय बीमा कंपनी अभिप्रेत है जिसे साधारण बीमा व्यवसाय अथवा स्वास्थ्य बीमा व्यवसाय करने के लिए समय-समय पर अधिसूचित आईआरडीए (भारतीय बीमा कंपनियों का पंजीकरण) विनियम, 2000 के अधीन प्राधिकरण द्वारा पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदान किया गया हो;
- ठ) इन विनियमों के प्रयोजन के लिए, `बीमा खंड' से निम्नलिखित अभिप्रेत हैं
- i) अग्नि;
- ii) मरीन;
- iii) स्वास्थ्य (वैयक्तिक दुर्घटना और यात्रा सहित);
- iv) मोटर;
- v) विविध;
- vi) कोई अन्य खंड (विविध खंड के अंतर्गत) जो व्यवसाय के विविध खंड के सकल अंकित प्रीमियम के 10 प्रतिशत से अधिक अंशदान करता हो;
- vii) समय-समय पर प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट रूप में कोई अन्य खंड;
- ड) `समूह' (पूल) से बीमा अथवा पुनबीमा का कोई संयुक्त जोखिम-अंकन परिचालन अभिप्रेत है जिसमें सहभागी बीमाकर्ता अथवा पुनबीमाकर्ता समस्त अंकित व्यवसाय में एक पूर्व निर्धारित और नियत अंश ग्रहण करते हैं;
- ढ) `वापसी' (रेट्रोसेशन) से ऐसा लेनदेन अभिप्रेत है जिसके द्वारा पुनबीमाकर्ता किसी अन्य बीमाकर्ता अथवा पुनबीमाकर्ता को अपने द्वारा पूर्व में ग्रहण किये हुए पुनबीमे का संपूर्ण अथवा आंशिक रूप में अध्यर्पण करता है;
- ण) `प्रतिधारण' से जोखिम का वह अंश अभिप्रेत है जो बीमाकर्ता / पुनबीमाकर्ता अपनी जिम्मेदारी पर ग्रहण करता है;
- त) `पुनबीमा संविदा' सभी पक्षकारों पर कानूनी तौर पर बाध्यकारी दस्तावेज है जो पुनबीमा संविदा की सभी शर्तों और अन्य प्रावधानों का एक संपूर्ण, सही और निश्चित अभिलेख उपलब्ध कराता है;
- थ) `समझौता' (ट्रीटी) से अध्यर्पक और पुनबीमाकर्ता के बीच सामान्यतः एक वर्ष अथवा उससे अधिक अवधि के लिए पुनबीमा व्यवस्था अभिप्रेत है जो व्यवसाय के परिभाषित वर्ग अथवा वर्गों के पुनबीमा के लिए लागू तकनीकी विवरण और वित्तीय शर्तें निर्धारित करती है;
- द) इन विनियमों में प्रयुक्त और अपरिभाषित, परंतु बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) अथवा साधारण बीमा व्यवसाय राष्ट्रीयकरण अधिनियम, 1972 (1972 का 57) अथवा बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) अथवा उनके अधीन बनाये गये नियमों में परिभाषित शब्दों और अभिव्यक्तियों के अर्थ वही होंगे जो उन अधिनियमों अथवा नियमों में, जैसी स्थिति हो, क्रमशः उनके लिए निर्धारित किये गये हैं।
3. पुनबीमा व्यवस्थाएँ: उद्देश्य और प्रक्रियाएँ
(1) उद्देश्य
प्रत्येक भारतीय बीमाकर्ता / भारतीय पुनबीमाकर्ता / विदेशी पुनबीमाकर्ता की शाखा के पुनबीमा कार्यक्रम के लिए निम्नलिखित उद्देश्यों द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त किया जाएगाः
- (क) देश के अंदर प्रतिधारण को उच्चतम सीमा तक बढ़ाना;
- (ख) पर्याप्त क्षमता को विकसित करना;
- (ग) एक उचित लागत पर पॉलिसीधारक / बीमाकर्ता के हितों के संरक्षण के लिए अपेक्षित सर्वोत्तम संभव पुनबीमा सुरक्षा / बीमा-रक्षा सुनिश्चित करना;
- (घ) व्यवसाय के संचालन को सरल बनाना।
(2) प्रतिधारण नीति
- क) प्रत्येक भारतीय बीमाकर्ता / भारतीय पुनबीमाकर्ता / विदेशी पुनबीमाकर्ता की शाखा द्वारा अपनी वित्तीय क्षमता, जोखिमों की गुणवत्ता और व्यवसाय की मात्रा के अनुरूप अधिकतम संभव प्रतिधारण अनुरक्षित किया जाएगा।
- ख) प्रत्येक भारतीय बीमाकर्ता / भारतीय पुनबीमाकर्ता / विदेशी पुनबीमाकर्ता की शाखा द्वारा प्रत्येक बीमा खंड के लिए एक उपयुक्त प्रतिधारण नीति बनाई जाएगी। यदि बीमा खंड के अंतर्गत एक से अधिक उत्पाद हों, तो प्रत्येक उत्पाद के लिए प्रतिधारण नीति अलग से परिभाषित की जाएगी।
- ग) प्राधिकरण किसी भारतीय बीमाकर्ता / भारतीय पुनबीमाकर्ता / विदेशी पुनबीमाकर्ता की शाखा से यह अपेक्षा कर सकता है कि वह अपनी प्रतिधारण नीति को उचित सिद्ध करे तथा यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक समझे गए रूप में निर्देश दे सकता है कि भारतीय बीमाकर्ता /भारतीय पुनबीमाकर्ता / विदेशी पुनबीमाकर्ता की शाखा केवल सीमापार पुनबीमाकर्ता के लिए क्रेंटिंग न करे।